- Supreme Court Verdict: पूर्व विधायक सोम प्रकाश सिंह को बड़ा झटका
औरंगाबाद। बिहार की राजनीति से जुड़े एक चर्चित मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद पूर्व विधायक सोम प्रकाश सिंह की सदस्य पेंशन बंद कर दी गई है। बिहार विधानसभा सचिवालय ने 15वीं बिहार विधानसभा में औरंगाबाद के ओबरा विधानसभा क्षेत्र से सदस्य रहे सोम प्रकाश सिंह का नाम सदस्यों की सूची से हटाने का भी आदेश जारी किया है।

विधानसभा सचिवालय की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 28 जनवरी 2026 को दिए गए निर्णय तथा महाधिवक्ता से प्राप्त विधिक परामर्श के आधार पर यह कार्रवाई की गई है। इसके तहत पूर्व विधायक को मिलने वाली पेंशन एवं अन्य सुविधाओं को तत्काल प्रभाव से रोकने का निर्देश दिया गया है।
विधानसभा सचिवालय ने जारी किया आदेश
बिहार विधानसभा सचिवालय के अवर सचिव जय प्रकाश दूबे ने महालेखाकार (लेखा एवं हकदारी) कार्यालय, पटना को पत्र भेजकर स्पष्ट निर्देश दिया कि सोम प्रकाश सिंह को पूर्व सदस्य के रूप में दी जा रही सभी सुविधाएं बंद की जाएं। सचिवालय ने माना कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद उन्हें 15वीं बिहार विधानसभा का वैध सदस्य नहीं माना जा सकता।
इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि वे उस कार्यकाल से जुड़े किसी भी लाभ, वेतन, भत्ता या पेंशन के हकदार नहीं होंगे।
प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने बताई “सत्य की जीत”
इस मामले में न्यायिक लड़ाई लड़ने वाले तत्कालीन जदयू नेता और वर्तमान भाजपा नेता प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने फैसले को “सत्य की जीत” बताया। उन्होंने कहा कि वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद न्याय मिला है।
उन्होंने मांग की है कि उन्हें 15वीं विधानसभा कार्यकाल का वैधानिक सदस्य घोषित किया जाए और लंबित वेतन, भत्ता एवं अन्य सुविधाओं का भुगतान किया जाए। इस संबंध में उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग को पत्र भी भेजा है।
दारोगा पद से इस्तीफा बना विवाद की वजह
गौरतलब है कि सोम प्रकाश सिंह वर्ष 2010 में दारोगा पद से इस्तीफा देकर चुनाव मैदान में उतरे थे। बाद में आरोप लगा कि उनका इस्तीफा विभागीय स्तर पर स्वीकार नहीं हुआ था क्योंकि उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई लंबित थी। इसी आधार पर उनके निर्वाचन को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
पटना हाईकोर्ट ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी थी, जिसके खिलाफ सोम प्रकाश सिंह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी अपील खारिज कर दी।
राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को बिहार की संसदीय राजनीति और निर्वाचन न्यायशास्त्र का अहम मामला मान रहे हैं।
