Poetry: काली कोयल; तेरी बोली, सबको लगती कितनी भोली

काली कोयल

काली कोयल, तेरी बोली,।
सबको लगती कितनी भोली।

मीठे – मीठे गीत सुनाती,
सबके मन को खूब लुभाती।

सावन की जब ऋतु है आती,
आम के बाग़ों में इतराती।

डाली – डाली नाच दिखाती,
कूक-कूक सबको हरषाती।

सारे गुण हैं तेरे पास,
मीठी वाणी तेरी ख़ास।

फिर भी मन में यह संदेह-
काली क्यों है तेरी देह?

कोयल बोली हँसकर प्यारी-
“रंग नहीं है मुझ पर भारी ।

मीठे बोल, सरल व्यवहार,
इनसे मिलता सबका प्यार।

तन का रंग न साथ निभाता,
गुण का उजियारा रह जाता।

यही सीख मैं सबको देती-
वाणी से मैं मन हर लेती।”

डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक

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