काली कोयल

काली कोयल, तेरी बोली,।
सबको लगती कितनी भोली।
मीठे – मीठे गीत सुनाती,
सबके मन को खूब लुभाती।
सावन की जब ऋतु है आती,
आम के बाग़ों में इतराती।
डाली – डाली नाच दिखाती,
कूक-कूक सबको हरषाती।
सारे गुण हैं तेरे पास,
मीठी वाणी तेरी ख़ास।
फिर भी मन में यह संदेह-
काली क्यों है तेरी देह?
कोयल बोली हँसकर प्यारी-
“रंग नहीं है मुझ पर भारी ।
मीठे बोल, सरल व्यवहार,
इनसे मिलता सबका प्यार।
तन का रंग न साथ निभाता,
गुण का उजियारा रह जाता।
यही सीख मैं सबको देती-
वाणी से मैं मन हर लेती।”
डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक
