
ख़ामोशी छाई थी
शाम गहराई थी
अजब तन्हाई थी
मैं तुम्हें याद कर रही थी
दीप जल रहे थे
सितारे निकल रहे थे
साये पिघल रहे थे
मैं तुम्हें याद कर रही थी
उड़ने लगे थे जुगनू
मन हुआ था बेकाबू
आँखों में भर के आँसू
मैं तुम्हें याद कर रही थी
उतरी जब शिकारों से
मैं झील के किनारों से
जब गुज़री मैं चनारों से
मैं तुम्हें याद कर —-
घिर रही थी घटायें
गा रही थी हवायें
महक उठी थी फ़िज़ायें
मैं तुम्हें याद कर रही थी
फिर आ गया था सावन
महक उठा था आँगन
थिरक उठा था तन-मन
मैं तुम्हें याद कर रही थी
मन उदासी से भर गया
लम्हा- लम्हा बिखर गया
यूँ ही दिन गुज़र गया
मैं तुम्हें याद कर रही थी
जब रुत के ज़ख़्म सिल रहे थे
जब नये फूल खिल रहे थे
जब धरती अम्बर मिल रहे थे
मैं तुम्हें याद कर रही थी ।
जब मंदिर में शंख बजे
जब पूजा के थाल सजे
ठीक शाम के सात बजे
मैं तुम्हें याद कर रही थी।
डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक
