औरंगाबाद(लाइव इंडिया न्यूज 18 ब्यूरो)। बिहार के औरंगाबाद जिले के कुटुम्बा अंचल कार्यालय में राजस्व व्यवस्था का एक नमूना सामने आया है, जहां कागज पर ही परिवार बढ़ा दिया गया। आरोप है कि दो भाइयों की जमीन पर तीसरा फर्जी भाई खड़ा कर म्यूटेशन कर दिया गया।
दाखिल खारिज मामले में हुआ बड़ा खेल–
मामला कुटुम्बा अंचल कार्यालय के दाखिल-खारिज वाद संख्या- 725/2014-15 का है। पीड़ित युगेश कुमार के अनुसार उनके दादा स्व. जगदेव मेहता और बौध मेहता दो भाई थे। आरोप है कि तत्कालीन अंचल अधिकारी ने इसी में जबरन तीसरा नाम मोहर मेहता जोड़ दिया। इसके लिए युगेश कुमार के पिता सालिक मेहता के फर्जी हस्ताक्षर वाला आवेदन लगाकर आधार बनाया गया। यानी पिता ने आवेदन दिया भी नहीं और फाइल में उनके हस्ताक्षर से दाखिल खारिज वाद संख्या-725/2014-15 को निष्पादित कर फर्जी तरीके से जमीन का परिमार्जन कर डिमांड रजिस्टर-2 में मोहर मेहता का नाम जोड़ दिया गया। इस खेल का पता चलने पर पीड़ित ने इसकी बाजाप्ता नकल मांगी।

बाजाप्ता नकल मांगने पर दूसरा खेल शुरू–
बाजाप्ता नकल मांगने के बाद अंचल कार्यालय में कुछ दूसरा ही खेल शुरू हो गया। युगेश का आरोप है कि उन्हें सिर्फ डिमांड रजिस्टर-2 की बाजाप्ता नकल थमा दी गई, लेकिन जिस मूल आवेदन पर पूरा दाखिल-खारिज वाद टिका है, वही फाइल गायब बता दी गई। चिरकुट देकर, एक साल से अधिक समय से प्रथम और द्वितीय अपील तक दौड़ने के बाद भी जवाब एक ही मिला – खोज जारी है।

साजिश के तहत गायब किया गया रिकॉर्ड–
सवाल है कि आखिर यह खोज कब पूरी होगी? पीड़ित का सवाल इसी पर है कि अगर पानी से सब सड़ गया तो सिर्फ उसी वाद का आवेदन कैसे गला? बाकी रजिस्टर कैसे बच गए? पीड़ित ने आरोप लगाया है कि यह रिकॉर्ड गायब होना नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश है, जिसमें भू-माफिया को बचाने के लिए फाइल को ही गायब कर दिया गया है।

फाइल ढूंढ़ने में सालो लगने पर भी ढ़ेरो सवाल–
एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन दाखिल-खारिज की बात करती है, दूसरी तरफ कुटुम्बा में एक फाइल ढूंढने में सालों लग रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि फाइल को गायब किसने किया? इसमें किसकी संलिप्तता है। सवाल यह है कि यदि पीड़ित कुटुम्बा के अंचल अधिकारी, रिकॉर्ड का रखरखाव करनेवाले क्लर्क और दफ्तरी की मामले में गहरी संलिप्तता का आरोप लगा रहा है, तो इस आरोप की जांच कौन करायेगा? क्या वरीय अधिकारियों का इस गंभीर मामले का निष्पक्ष जांच कराना दायित्व नही बनता है?

खुद को पाक साफ बता रहे अंचल अधिकारी–
मामले में वर्तमान अंचल अधिकारी चंद्रप्रकाश कुमार खुद को पाक साफ बता रहे है। वें तर्क दे रहे है कि यह मामला उनके कार्यकाल का नहीं है। उस पर तुक्का यह भी जोड़ रहे है कि अंचल कार्यालय का पुराना कार्यालय जर्जर था, पानी रिसता था, कई पुराने अभिलेख सड़-गल गए। तलाश जारी है, मिलते ही नकल दे दी जाएगी, पर समय-सीमा बताना मुश्किल है। यहां भी सवाल यह उठता है कि क्या अंचल अधिकारी को कुटुम्बा अंचल का प्रभार लेते ही यह ज्ञात हुआ था कि अंचल कार्यालय के कुछ रिकॉर्ड सड़ गल या नष्ट हो गये है, इस बात पर वें मौन है? पीड़ित का आरोप है कि चिरकुट दाखिल कर बाजाप्ता नकल आवेदन देने के बाद ही भू-माफिया की साजिश के तहत अभिलेख नही मिलने की बातों वाला खेल खेला जा रहा है। मामले में अंचल अधिकारी की गहरी संलिप्तता है। इसकी जांच और कार्रवाई दोनों ही होनी चाहिए। न्याय मिलने तक वें चुप नही बैठेंगे। कहते है कि न्याय में विलंब भी अन्याय के समान ही होता है और मामले में काफी विलंब तो ही चुका है। ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि पीड़ित को न्याय मिलेगा या नही अथवा वह यूं ही दर दर भटकता रहेगा?
