फिर आ गया है सावन
————————

फिर आ गया है सावन-
आसमान से मोती झर रहे हैं,
क्या तुमने उन्हें
अपनी हथेलियों में सहेजा है?
घर की खिड़कियों के परदे हटाकर
मन के झरोखे खोले हैं क्या?
बादल बाँहें फैलाए आए हैं,
क्या तुमने उनसे गले मिलना सीखा है?
तुम क्या समझो सावन!
एक बूँद गिरते ही
छाता खोल लेते हो।
यह ऋतु हर रोज़ नहीं उतरती,
कभी बेवजह भी भीगकर देखो,
पवन का मधुर गीत सुनो,
रिमझिम को अपनी आत्मा में उतरने दो।
मैं तो इन महकती, बरसती
मोतियों की लड़ियों के आगे
सोने के झुमके भी ठुकरा दूँ,
दफ़्तर से छुट्टी ले लूँ,
पर इन अनमोल क्षणों को
हाथों से फिसलने न दूँ।
ये बूँदें मात्र जल नहीं,
भीगे हुए अहसास हैं।
तुम्हें तुम्हारा वही बचपन
याद दिलाने आई हैं-
जो अब भी कहीं
तुम्हारे भीतर साँस ले रहा है।
कहाँ गई वह काग़ज़ की कश्ती?
किस चिंता की धारा में बह गई?
घटाएँ आज भी
तुमसे यही प्रश्न करती हैं।
पेड़ों से छनकर आती,
पायल-सी छनकती बूँदों को
कब आख़िरी बार
ठहरकर निहारा था तुमने?
भीगी बेलों की छाँव तले
कुछ पल चुपचाप बिताए हैं क्या?
कहाँ इतने व्यस्त हो गए हो,
किस दुनिया में खो गए हो,
कि सावन हर बरस
तुम्हें पुकारकर लौट जाता है।
डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक
